श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

दौर्भाग्येनात्मनो४ लोके विश्रुता दुर्भगेति सा।

या तुष्टा राजर्षये तु वृतादात्पूरवे वरम्॥ २०

daurbhāgyenātmano loke viśrutā durbhageti sā|

yā tuṣṭā rājarṣaye tu vṛtādātpūrave varam|| 20

अर्थ

वह कालकन्या (जरा) बड़ी भाग्यहीना थी, इसलिये लोग उसे ‘दुर्भगा’ कहते थे। एक बार राजर्षि पूरुने पिताको अपना यौवन देनेके लिये अपनी ही इच्छासे उसे वर लिया था, इससे प्रसन्‍न होकर उसने उन्हें राज्यप्राप्तिका वर दिया था॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—दौर्भगेन।

    (मुद्रित पृष्ठ 544)

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