॥ श्रीहरिः ॥
दिव्यवर्षसहस्राणां सहस्रमहतौजसः।
भौमान् भोक्ष्यथ भोगान् वै दिव्यांश्चानुग्रहान्मम॥ १७
divyavarṣasahasrāṇāṃ sahasramahataujasaḥ|
bhaumān bhokṣyatha bhogān vai divyāṃścānugrahānmama|| 17
अर्थ
तुमलोग मेरी कृपासे दस लाख दिव्य वर्षोंतक पूर्ण बलवान् रहकर अनेकों प्रकारके पार्थिव और दिव्य भोग भोगोगे॥ १७॥✎ 1915
दिव्यवर्षसहस्राणां सहस्रमहतौजसः।
भौमान् भोक्ष्यथ भोगान् वै दिव्यांश्चानुग्रहान्मम॥ १७
तुमलोग मेरी कृपासे दस लाख दिव्य वर्षोंतक पूर्ण बलवान् रहकर अनेकों प्रकारके पार्थिव और दिव्य भोग भोगोगे॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 566) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1915 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ज्ञान-स्वरूप → ज्ञानस्वरूप