श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.51

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

आत्ममायां समाविश्य सोऽहं गुणमयीं द्विज।

सृजन् रक्षन् हरन् विश्‍वं दध्रे संज्ञां क्रियोचिताम्॥ ५१

ātmamāyāṃ samāviśya so'haṃ guṇamayīṃ dvija|

sṛjan rakṣan haran viśvaṃ dadhre saṃjñāṃ kriyocitām|| 51

अर्थ

विप्रवर! अपनी त्रिगुणात्मिका मायाको स्वीकार करके मैं ही जगत‍्की रचना, पालन और संहार करता रहता हूँ और मैंने ही उन कर्मोंके अनुरूप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर—ये नाम धारण किये हैं॥ ५१॥

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