॥ श्रीहरिः ॥
तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि।
ब्र२ह्मरुद्रौ च भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति॥ ५२
tasmin brahmaṇyadvitīye kevale paramātmani|
brahmarudrau ca bhūtāni bhedenājño'nupaśyati|| 52
अर्थ
ऐसा जो भेदरहित विशुद्ध परब्रह्मस्वरूप मैं हूँ, उसीमें अज्ञानी पुरुष ब्रह्मा, रुद्र तथा अन्य समस्त जीवोंको विभिन्न रूपसे देखता है॥ ५२॥
तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि।
ब्रह्मरुद्रौ च भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति॥ ५२
ऐसा जो भेदरहित विशुद्ध परब्रह्मस्वरूप मैं हूँ, उसीमें अज्ञानी पुरुष ब्रह्मा, रुद्र तथा अन्य समस्त जीवोंको विभिन्न रूपसे देखता है॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 441) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/7/52/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—देहात्मबुद्धिर्भूतानि।
(मुद्रित पृष्ठ 441)