श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.53

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

यथा पुमान्‍न स्वांगेषु शिरःपा३ण्यादिषु क्‍वचित्।

पारक्यबुद्धिं कुरुते एवं भूतेषु मत्परः॥ ५३

yathā pumānna svāṃgeṣu śiraḥpāṇyādiṣu kvacit|

pārakyabuddhiṃ kurute evaṃ bhūteṣu matparaḥ|| 53

अर्थ

जिस प्रकार मनुष्य अपने सिर, हाथ आदि अंगोंमें ‘ये मुझसे भिन्‍न हैं’ ऐसी बुद्धि कभी नहीं करता, उसी प्रकार मेरा भक्त प्राणिमात्रको मुझसे भिन्‍न नहीं देखता॥ ५३॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—ण्यादिना।

    (मुद्रित पृष्ठ 441)

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