जिस प्रकार मनुष्य अपने सिर, हाथ आदि अंगोंमें ‘ये मुझसे भिन्न हैं’ ऐसी बुद्धि कभी नहीं करता, उसी प्रकार मेरा भक्त प्राणिमात्रको मुझसे भिन्न नहीं देखता॥ ५३॥
यथा पुमान्न स्वांगेषु शिरःपाण्यादिषु क्वचित्।
पारक्यबुद्धिं कुरुते एवं भूतेषु मत्परः॥ ५३
जिस प्रकार मनुष्य अपने सिर, हाथ आदि अंगोंमें ‘ये मुझसे भिन्न हैं’ ऐसी बुद्धि कभी नहीं करता, उसी प्रकार मेरा भक्त प्राणिमात्रको मुझसे भिन्न नहीं देखता॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 441) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/7/53/