॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.9.43
परिरेभेऽङ्गजं दोर्भ्यां दीर्घोत्कण्ठमनाः श्वसन्।
विष्वक्सेनाङ्घ्रिसंस्पर्शहताशेषाघबन्धनम्॥ ४३
parirebhe'ṅgajaṃ dorbhyāṃ dīrghotkaṇṭhamanāḥ śvasan|
viṣvaksenāṅghrisaṃsparśahatāśeṣāghabandhanam|| 43
अर्थ
ध्रुवजी उपवनके पास आ पहुँचे, उन्हें देखते ही महाराज उत्तानपाद तुरंत रथसे उतर पड़े। पुत्रको देखनेके लिये वे बहुत दिनोंसे उत्कण्ठित हो रहे थे। उन्होंने झटपट आगे बढ़कर प्रेमातुर हो, लंबी-लंबी साँसें लेते हुए, ध्रुवको भुजाओंमें भर लिया। अब ये पहलेके ध्रुव नहीं थे, प्रभुके परमपुनीत पादपद्मोंका स्पर्श होनेसे इनके समस्त पाप-बन्धन कट गये थे॥ ४२-४३॥✎ 1946