॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.9.42
तं दृष्ट्वोपवनाभ्याश आयान्तं तरसा रथात्।
अवरुह्य नृपस्तूर्णमासाद्य प्रेमविह्वलः॥ ४२
taṃ dṛṣṭvopavanābhyāśa āyāntaṃ tarasā rathāt|
avaruhya nṛpastūrṇamāsādya premavihvalaḥ|| 42
अर्थ
ध्रुवजी उपवनके पास आ पहुँचे, उन्हें देखते ही महाराज उत्तानपाद तुरंत रथसे उतर पड़े। पुत्रको देखनेके लिये वे बहुत दिनोंसे उत्कण्ठित हो रहे थे। उन्होंने झटपट आगे बढ़कर प्रेमातुर हो, लंबी-लंबी साँसें लेते हुए, ध्रुवको भुजाओंमें भर लिया। अब ये पहलेके ध्रुव नहीं थे, प्रभुके परमपुनीत पादपद्मोंका स्पर्श होनेसे इनके समस्त पाप-बन्धन कट गये थे॥ ४२-४३॥✎ 1946