श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.48

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

उत्तमश्‍च ध्रुवश्चोभावन्योन्यं प्रेमविह्वलौ।

अंगसंगादुत्पुलकावस्रौघं मुहुरूहतुः॥ ४८

uttamaśca dhruvaścobhāvanyonyaṃ premavihvalau|

aṃgasaṃgādutpulakāvasraughaṃ muhurūhatuḥ|| 48

अर्थ

इधर उत्तम और ध्रुव दोनों ही प्रेमसे विह्वल होकर मिले। एक- दूसरेके अंगोंका स्पर्श पाकर उन दोनोंके ही शरीरमें रोमांच हो आया तथा नेत्रोंसे बार-बार आँसुओंकी धारा बहने लगी॥ ४८॥✎ 1962

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1962 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): आसुओंकी → आँसुओंकी

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