श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.49

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

सुनीतिरस्य जननी प्राणेभ्योऽपि प्रियं सुतम्।

उपगुह्य जहावाधिं तदंगस्पर्शनिर्वृता॥ ४९

sunītirasya jananī prāṇebhyo'pi priyaṃ sutam|

upaguhya jahāvādhiṃ tadaṃgasparśanirvṛtā|| 49

अर्थ

ध्रुवकी माता सुनीति अपने प्राणोंसे भी प्यारे पुत्रको गले लगाकर सारा सन्ताप भूल गयी। उसके सुकुमार अंगोंके स्पर्शसे उसे बड़ा ही आनन्द प्राप्त हुआ॥ ४९॥✎ 1962

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1962 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): आसुओंकी → आँसुओंकी

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