श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.19

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

हेमजालाक्षनिर्गच्छद्धूमेनागुरुगन्धिना ।

पाण्डुरेण प्रतिच्छन्‍नमार्गे यान्ति सुरप्रियाः॥ १९

hemajālākṣanirgacchaddhūmenāgurugandhinā |

pāṇḍureṇa praticchannamārge yānti surapriyāḥ|| 19

अर्थ

सुनहली खिड़कियोंमेंसे अगरकी सुगन्धसे युक्त सफेद धूआँ निकल-निकलकर वहाँके मार्गोंको ढक दिया करता है। उसी मार्गसे देवांगनाएँ जाती-आती हैं॥ १९॥✎ 1971

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1971 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सौगन्धित → सौगन्धिक

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