श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.15.20

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

मुक्तावितानैर्मणिहेमकेतुभि-

र्नानापताकावलभीभिरावृताम् ।

शिखण्डिपारावतभृङ्गनादितां

वैमानिकस्त्रीकलगीतमङ्गलाम् ॥ २०

muktāvitānairmaṇihemaketubhi-

rnānāpatākāvalabhībhirāvṛtām |

śikhaṇḍipārāvatabhṛṅganāditāṃ

vaimānikastrīkalagītamaṅgalām || 20

अर्थ

स्थान-स्थानपर मोतियोंकी झालरोंसे सजाये हुए चँदोवे तने रहते हैं। सोनेकी मणिमय पताकाएँ फहराती रहती हैं। छज्जोंपर अनेकों झंडियाँ लहराती रहती हैं। मोर, कबूतर और भौंरे कलगान करते रहते हैं। देवांगनाओंके मधुर संगीतसे वहाँ सदा ही मंगल छाया रहता है॥ २०॥✎ 1971

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1971 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सौगन्धित → सौगन्धिक

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