श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.17.12

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

देवमातर्भवत्या मे विज्ञातं चिरकाङ्क्षितम्।

यत् सपत्नैर्हृतश्रीणां च्यावितानां स्वधामतः॥ १२

devamātarbhavatyā me vijñātaṃ cirakāṅkṣitam|

yat sapatnairhṛtaśrīṇāṃ cyāvitānāṃ svadhāmataḥ|| 12

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—देवताओंकी जननी अदिति! तुम्हारी चिरकालीन अभिलाषाको मैं जानता हूँ। शत्रुओंने तुम्हारे पुत्रोंकी सम्पत्ति छीन ली है, उन्हें उनके लोक (स्वर्ग)-से खदेड़ दिया है॥ १२॥✎ 775 776

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #775 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #776 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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