स्वमायुर्द्विजलिङ्गेभ्यो देवेभ्योऽदात् स याचितः॥ १४
pitā prahrādaputraste tadvidvān dvijavatsalaḥ|
svamāyurdvijaliṅgebhyo devebhyo'dāt sa yācitaḥ|| 14
अर्थ
राजन्! आपके पिता प्रह्लादनन्दन विरोचन बड़े ही ब्राह्मणभक्त थे। यहाँतक कि उनके शत्रु देवताओंने ब्राह्मणोंका वेष बनाकर उनसे उनकी आयुका दान माँगा और उन्होंने ब्राह्मणोंके छलको जानते हुए भी अपनी आयु दे डाली॥ १४॥✎ 793
पिता प्रह्रादपुत्रस्ते तद्विद्वान् द्विजवत्सलः।
स्वमायुर्द्विजलिङ्गेभ्यो देवेभ्योऽदात् स याचितः॥ १४
राजन्! आपके पिता प्रह्लादनन्दन विरोचन बड़े ही ब्राह्मणभक्त थे। यहाँतक कि उनके शत्रु देवताओंने ब्राह्मणोंका वेष बनाकर उनसे उनकी आयुका दान माँगा और उन्होंने ब्राह्मणोंके छलको जानते हुए भी अपनी आयु दे डाली॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 994) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#793 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् को → विष्णुभगवान्को