श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.5.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अथ पञ्चमोऽध्यायः

देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाना और ब्रह्माकृत भगवान्‌की स्तुति✎ 676

श्रीशुक उवाच

रा२जन्‍नुदितमेतत् ते हरेः कर्माघनाशनम्।

गजेन्द्रमोक्षणं पुण्यं रैवतं त्वन्तरं शृणु॥ १

rājannuditametat te hareḥ karmāghanāśanam|

gajendramokṣaṇaṃ puṇyaṃ raivataṃ tvantaraṃ śṛṇu|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌की यह गजेन्द्रमोक्षकी पवित्र लीला समस्त पापोंका नाश करनेवाली है। इसे मैंने तुम्हें सुना दिया। अब रैवत मन्वन्तरकी कथा सुनो॥ १॥✎ 677

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—राजंश्‍चरितमेतत्ते।

    (मुद्रित पृष्ठ 922)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #677 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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