श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

नवम स्कन्ध · अध्याय 17

18 श्लोक · 7 टिप्पणियाँ · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 84–85

श्लोक-सूची

श्रीशुक उवाच

पृष्ठ 84

यः पुरूरवसः पुत्र आयुस्तस्याभवन् सुताः।

नहुषः क्षत्रवृद्धश्‍च रजी रम्भश्‍च वीर्यवान्॥ १ 9.17.1

अनेना इति राजेन्द्र शृणु क्षत्रवृधोऽन्वयम्।

क्षत्रवृद्धसुतस्यासन् सुहोत्रस्यात्मजास्त्रयः॥ २9.17.2

काश्यः कुशो गृत्समद इति गृत्समदादभूत्।

शुनकः शौनको यस्य बह्वृचप्रवरो मुनिः॥ ३9.17.3

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! राजेन्द्र पुरूरवाका एक पुत्र था आयु। उसके पाँच लड़के हुए—नहुष, क्षत्रवृद्ध, रजि, शक्तिशाली रम्भ और अनेना। अब क्षत्रवृद्धका वंश सुनो। क्षत्रवृद्धके पुत्र थे सुहोत्र। सुहोत्रके तीन पुत्र हुए—काश्य, कुश और गृत्समद। गृत्समदका पुत्र हुआ शुनक। इसी शुनकके पुत्र ऋग्वेदियोंमें श्रेष्ठ मुनिवर शौनकजी हुए॥ १—३॥

काश्यस्य काशिस्तत्पुत्रो राष्ट्रो दीर्घतमःपिता।

धन्वन्तरिर्दैर्घतम आयुर्वेदप्रवर्तकः॥ ४ 9.17.4

यज्ञभुग् वासुदेवांशः स्मृतमात्रार्तिनाशनः।

तत्पुत्रः केतुमानस्य जज्ञे भीमरथस्ततः॥ ५9.17.5

काश्यका पुत्र काशि, काशिका राष्ट्र, राष्ट्रका दीर्घतमा और दीर्घतमाके धन्वन्तरि। यही आयुर्वेदके प्रवर्तक हैं॥ ४॥ ये यज्ञभागके भोक्ता और भगवान् वासुदेवके अंश हैं। इनके स्मरणमात्रसे ही सब प्रकारके रोग दूर हो जाते हैं। धन्वन्तरिका पुत्र हुआ केतुमान् और केतुमान्का भीमरथ॥ ५॥

दिवोदासो द्युमांस्तस्मात् प्रतर्दन इति स्मृतः।

स एव शत्रुजिद् वत्स ऋतध्वज इतीरितः।

तथा कुवलयाश्‍वेति प्रोक्तोऽलर्कादयस्ततः॥ ६9.17.6

षष्टिवर्षसहस्राणि षष्टिवर्षशतानि च।

नालर्कादपरो राजन्१ मेदिनीं बुभुजे युवा॥ ७9.17.7

अलर्कात् सन्ततिस्तस्मात् सुनीथोऽथ सुकेतनः२।

धर्मकेतुः सुतस्तस्मात् सत्यकेतुरजायत॥ ८9.17.8

भीमरथका दिवोदास और दिवोदासका द्युमान्—जिसका एक नाम प्रतर्दन भी है। यही द्युमान् शत्रुजित्, वत्स, ऋतध्वज और कुवलयाश्‍वके नामसे भी प्रसिद्ध है। द्युमान्‌के ही पुत्र अलर्क आदि हुए॥ ६॥ परीक्षित्! अलर्कके सिवा और किसी राजाने छाछठ हजार (६६,०००) वर्षतक युवा रहकर पृथ्वीका राज्य नहीं भोगा॥ ७॥ अलर्कका पुत्र हुआ सन्तति, सन्ततिका सुनीथ, सुनीथका सुकेतन, सुकेतनका धर्मकेतु और धर्मकेतुका सत्यकेतु॥ ८॥

पृष्ठ 85

धृष्टकेतुः सुतस्तस्मात् सुकुमारः क्षितीश्‍वरः।

वीतिहोत्रस्य भर्गोऽतो भार्गभूमिरभून्‍नृपः ॥ ९9.17.9

पृष्ठ 85

सत्यकेतुसे धृष्टकेतु, धृष्टकेतुसे राजा सुकुमार, सुकुमारसे वीतिहोत्र, वीतिहोत्रसे भर्ग और भर्गसे राजा भार्गभूमिका जन्म हुआ॥ ९॥

इतीमे काशयो भूपाः क्षत्रवृद्धान्वयायिनः।

रम्भस्य१ रभसः पुत्रो गम्भीरश्‍चा२क्रियस्ततः॥ १०9.17.10

तस्य क्षेत्रे ब्रह्म जज्ञे शृणु वंशमनेनसः।

शुद्धस्ततः३ शुचिस्तस्मात् त्रिककुद् धर्मसारथिः॥ ११9.17.11

ततः शान्तरयो जज्ञे कृतकृत्यः स आत्मवान्।

रजेः पंचशतान्यासन् पुत्राणाममितौजसाम्॥ १२9.17.12

ये सब-के-सब क्षत्रवृद्धके वंशमें काशिसे उत्पन्‍न नरपति हुए। रम्भके पुत्रका नाम था रभस, उससे गम्भीर और गम्भीरसे अक्रियका जन्म हुआ॥ १०॥ अक्रियकी पत्‍नीसे ब्राह्मणवंश चला। अब अनेनाका वंश सुनो। अनेनाका पुत्र था शुद्ध, शुद्धका शुचि, शुचिका त्रिककुद् और त्रिककुद्का धर्मसारथि॥ ११॥ धर्मसारथिके पुत्र थे शान्तरय। शान्तरय आत्मज्ञानी होनेके कारण कृतकृत्य थे, उन्हें सन्तानकी आवश्यकता न थी। परीक्षित्! आयुके पुत्र रजिके अत्यन्त तेजस्वी पाँच सौ पुत्र थे॥ १२॥

देवैरभ्यर्थितो दैत्यान् हत्वेन्द्रायाददाद् दिवम्।

इन्द्रस्तस्मै पुनर्दत्त्वा गृहीत्वा चरणौ रजेः॥ १३9.17.13

आत्मानमर्पयामास प्रह्रादाद्य४रिशंकितः।✎ 1137

पितर्युपरते पुत्रा याचमानाय नो ददुः॥ १४9.17.14

त्रिविष्टपं महेन्द्राय यज्ञभागान् समाददुः।

गुरुणा हूयमानेऽ‌ग्‍नौ बलभित् तनयान् रजेः॥ १५ 9.17.15

अवधीद् भ्रंशितान् मार्गान्‍न कश्‍चिदवशेषितः।

कुशात् प्रतिः क्षात्रवृद्धात् संजयस्तत्सुतो जयः॥ १६9.17.16

ततः कृतः कृतस्यापि जज्ञे हर्यवनो नृपः।

सहदेवस्ततो हीनो जयसेनस्तु तत्सुतः॥ १७9.17.17

संकृतिस्तस्य च५ जयः क्षत्रधर्मा महारथः।

क्षत्रवृद्धान्वया भूपाः शृणु वंशं च नाहुषात्॥ १८9.17.18

देवताओंकी प्रार्थनासे रजिने दैत्योंका वध करके इन्द्रको स्वर्गका राज्य दिया। परन्तु वे अपने प्रह्लाद आदि शत्रुओंसे भयभीत रहते थे, इसलिये उन्होंने वह स्वर्ग फिर रजिको लौटा दिया और उनके चरण पकड़कर उन्हींको अपनी रक्षाका भार भी सौंप दिया। जब रजिकी मृत्यु हो गयी, तब इन्द्रके माँगनेपर भी रजिके पुत्रोंने स्वर्ग नहीं लौटाया। वे स्वयं ही यज्ञोंका भाग भी ग्रहण करने लगे। तब गुरु बृहस्पतिजीने इन्द्रकी प्रार्थनासे अभिचारविधिसे हवन किया। इससे वे धर्मके मार्गसे भ्रष्ट हो गये। तब इन्द्रने अनायास ही उन सब रजिके पुत्रोंको मार डाला। उनमेंसे कोई भी न बचा। क्षत्रवृद्धके पौत्र कुशसे प्रति, प्रतिसे संजय और संजयसे जयका जन्म हुआ॥ १३—१६॥ जयसे कृत, कृतसे राजा हर्यवन, हर्यवनसे सहदेव, सहदेवसे हीन और हीनसे जयसेन नामक पुत्र हुआ॥ १७॥ जयसेनका संकृति, संकृतिका पुत्र हुआ महारथी वीरशिरोमणि जय। क्षत्रवृद्धकी वंश-परम्परामें इतने ही नरपति हुए। अब नहुषवंशका वर्णन सुनो॥ १८॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे
चन्द्रवंशानुवर्णने सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    राजा।

    (मुद्रित पृष्ठ 84)
  2. २

    सुतोत्तमः।

    (मुद्रित पृष्ठ 84)
  3. १

    नाभस्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 85)
  4. २

    श्‍चक्रकस्ततः।

    (मुद्रित पृष्ठ 85)
  5. ३

    शुद्धः शुचिस्ततस्तस्मा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 85)
  6. ४

    द्यवि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 85)
  7. ५

    तनयः।

    (मुद्रित पृष्ठ 85)

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