इस तरह कलियुगके दोष देखता और पृथ्वीपर विचरता हुआ मैं यमुनाजीके तटपर पहुँचा जहाँ भगवान् श्रीकृष्णकी अनेकों लीलाएँ हो चुकी हैं॥ ३७॥✎ 1954
एवं पश्यन् कलेर्दोषान् पर्यटन्नवनीमहम्।
यामुनं तटमापन्नो यत्र लीला हरेरभूत्॥ ३७
इस तरह कलियुगके दोष देखता और पृथ्वीपर विचरता हुआ मैं यमुनाजीके तटपर पहुँचा जहाँ भगवान् श्रीकृष्णकी अनेकों लीलाएँ हो चुकी हैं॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.1.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 36) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/1/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1954 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दशों → दसों