श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.29

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

क्षुत्क्षामौ तौ निरीक्ष्यैव पुनः स्वापपरायणौ।

ऋषिश्चिन्तापरो जातः किं विधेयं मयेति च॥ २९

kṣutkṣāmau tau nirīkṣyaiva punaḥ svāpaparāyaṇau|

ṛṣiścintāparo jātaḥ kiṃ vidheyaṃ mayeti ca|| 29

अर्थ

इस प्रकार भूख-प्यासके मारे अत्यन्त दुर्बल होनेके कारण उन्हें फिर सोते देख नारदजीको बड़ी चिन्ता हुई और वे सोचने लगे, ‘अब मुझे क्या करना चाहिये?॥ २९॥✎ 1966

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1966 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सुनाई → सुनायी

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