श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.2.4

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सत्यादित्रियुगे बोधवैराग्यौ मुक्तिसाधकौ।

कलौ तु केवला भक्तिर्ब्रह्मसायुज्यकारिणी॥ ४

satyāditriyuge bodhavairāgyau muktisādhakau|

kalau tu kevalā bhaktirbrahmasāyujyakāriṇī|| 4

अर्थ

सत्य, त्रेता और द्वापर—इन तीन युगोंमें ज्ञान और वैराग्य मुक्तिके साधन थे; किन्तु कलियुगमें तो केवल भक्ति ही ब्रह्मसायुज्य (मोक्ष)-की प्राप्ति करानेवाली है॥ ४॥✎ 9 10

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #9 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #10 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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