आप भक्तिके लिये जो उद्योग कर रहे हैं, यह आपके लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिये। भगवान्के भक्तके लिये तो भक्तिकी सम्यक् स्थापना करना सदा उचित ही है॥ ५५॥✎ 11
त्वयि चित्रं न मन्तव्यं भक्त्यर्थमनुवर्तिनि।
घटते कृष्णदासस्य भक्तेः संस्थापना सदा॥ ५५
आप भक्तिके लिये जो उद्योग कर रहे हैं, यह आपके लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिये। भगवान्के भक्तके लिये तो भक्तिकी सम्यक् स्थापना करना सदा उचित ही है॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.2.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 45) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/2/55/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)