॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.13.40
मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्।
सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासंगादयोऽगुणाः॥ ४०
māṃ bhajanti guṇāḥ sarve nirguṇaṃ nirapekṣakam|
suhṛdaṃ priyamātmānaṃ sāmyāsaṃgādayo'guṇāḥ|| 40
अर्थ
मैं समस्त गुणोंसे रहित हूँ और किसीकी अपेक्षा नहीं रखता। फिर भी साम्य, असंगता आदि सभी गुण मेरा ही सेवन करते हैं, मुझमें ही प्रतिष्ठित हैं; क्योंकि मैं सबका हितैषी, सुहृद्, प्रियतम और आत्मा हूँ। सच पूछो तो उन्हें गुण कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि वे सत्त्वादि गुणोंके परिणाम नहीं हैं और नित्य हैं॥ ४०॥✎ 1982