श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.13.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

देवगुह्यात्सरस्वत्यां सार्वभौम इति प्रभुः।

स्थानं पुरन्दराद्धृत्वा बलये दास्यतीश्‍वरः॥ १७ ✎ 1943

devaguhyātsarasvatyāṃ sārvabhauma iti prabhuḥ|

sthānaṃ purandarāddhṛtvā balaye dāsyatīśvaraḥ|| 17

अर्थ

देवगुह्यकी पत्‍नी सरस्वतीके गर्भसे सार्वभौम नामक भगवान्‌का अवतार होगा। ये ही प्रभु पुरन्दर इन्द्रसे स्वर्गका राज्य छीनकर राजा बलिको दे देंगे॥ १७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1943 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): पुरन्दराद् हृत्वा → पुरन्दराद्धृत्वा

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