श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

नवम स्कन्ध · अध्याय 12

16 श्लोक · 8 टिप्पणियाँ · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 65–66

श्लोक-सूची
पृष्ठ 65

श्रीशुक उवाच

कुशस्य चातिथिस्तस्मान्‍निषधस्तत्सुतो नभः।

पुण्डरीकोऽथ तत्पुत्रः क्षेमधन्वाभवत्ततः॥ १ 9.12.1

देवानीकस्ततोऽनीहः पारियात्रोऽथ तत्सुतः।

ततो बलस्थलस्तस्माद् वज्रनाभोऽर्कसंभवः॥ २9.12.2

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कुशका पुत्र हुआ अतिथि, उसका निषध, निषधका नभ, नभका पुण्डरीक और पुण्डरीकका क्षेमधन्वा॥ १॥ क्षेमधन्वाका देवानीक, देवानीकका अनीह, अनीहका पारियात्र, पारियात्रका बलस्थल और बलस्थलका पुत्र हुआ वज्रनाभ। यह सूर्यका अंश था॥ २॥

खगणस्तत्सुतस्तस्माद् विधृ१तिश्‍चाभवत् सुतः।

ततो हिरण्यनाभोऽभूद् योगाचार्यस्तु जैमिनेः॥ ३ 9.12.3

शिष्यः कौसल्य आध्यात्मं याज्ञवल्क्योऽध्यगाद् यतः।

योगं महोदयमृषिर्हृदयग्रन्थिभेदकम्२॥ ४ 9.12.4

वज्रनाभसे खगण, खगणसे विधृति और विधृतिसे हिरण्यनाभकी उत्पत्ति हुई। वह जैमिनिका शिष्य और योगाचार्य था॥ ३॥ कोसलदेशवासी याज्ञवल्क्य ऋषिने उसकी शिष्यता स्वीकार करके उससे अध्यात्मयोगकी शिक्षा ग्रहण की थी। वह योग हृदयकी गाँठ काट देनेवाला तथा परम सिद्धि देनेवाला है॥ ४॥

पुष्यो हिरण्यनाभस्य ध्रुवसन्धिस्ततोऽभवत्।

सुदर्शनोऽथाग्‍निवर्णः शीघ्रस्तस्य मरुः सुतः॥ ५ 9.12.5

योऽसावास्ते योगसिद्धः कलापग्राममाश्रितः।

कलेरन्ते सूर्यवंशं नष्टं भावयिता पुनः॥ ६9.12.6

हिरण्यनाभका पुष्य, पुष्यका ध्रुवसन्धि, ध्रुव-सन्धिका सुदर्शन, सुदर्शनका अग्‍निवर्ण, अग्‍निवर्णका शीघ्र और शीघ्रका पुत्र हुआ मरु॥ ५॥ मरुने योगसाधनासे सिद्धि प्राप्त कर ली और वह इस समय भी कलाप नामक ग्राममें रहता है। कलियुगके अन्तमें सूर्यवंशके नष्ट हो जानेपर वह उसे फिरसे चलायेगा॥ ६॥

तस्मात् ३प्रसुश्रुतस्तस्य सन्धिस्तस्याप्यमर्षणः।✎ 1871

महस्वांस्तत्सुतस्तस्माद् विश्‍वसाह्वोऽन्वजायत॥ ७ 9.12.7

ततः४ प्रसेनजित् तस्मात् तक्षको भविता पुनः।

ततो बृहद्बलो यस्तु पित्रा ते समरे हतः॥ ८9.12.8

मरुसे प्रसुश्रुत, उससे सन्धि और सन्धिसे अमर्षणका जन्म हुआ। अमर्षणका महस्वान् और महस्वान्का विश्‍वसाह्व॥ ७॥ विश्‍वसाह्वका प्रसेनजित्, प्रसेनजित्का तक्षक और तक्षकका पुत्र बृहद्बल हुआ। परीक्षित्! इसी बृहद्बलको तुम्हारे पिता अभिमन्युने युद्धमें मार डाला था॥ ८॥

पृष्ठ 66

एते हीक्ष्वाकुभूपाला अतीताः शृण्वनागतान्।

बृहद्बलस्य भविता पुत्रो नाम बृहद्रणः॥ ९ 9.12.9

उरुक्रियस्ततस्तस्य वत्सवृद्धो भविष्यति।

प्रतिव्योमस्ततो भानुर्दिवाको वाहिनीपतिः॥ १० 9.12.10

सहदेवस्ततो वीरो बृहदश्‍वोऽथ भानुमान्।

प्रतीकाश्‍वो भानुमतः सुप्रतीकोऽथ तत्सुतः॥ ११ 9.12.11

भविता मरुदेवोऽथ सुनक्षत्रोऽथ पुष्करः।

तस्यान्तरिक्षस्तत्पुत्रः सुतपास्तदमित्रजित्॥ १२ 9.12.12

बृहद्राजस्तु१ तस्यापि बर्हिस्तस्मात् कृतंजयः।

रणंजयस्तस्य सुतः संजयो भविता ततः॥ १३ 9.12.13

तस्माच्छाक्योऽथ२ शुद्धोदो लांगलस्तत्सुतः स्मृतः।

ततः प्रसेनजित् तस्मात् क्षुद्रको भविता ततः॥ १४ 9.12.14

रणको भविता तस्मात् सुरथस्तनयस्ततः।

सुमित्रो नाम निष्ठान्त एते बार्हद्बलान्वयाः३॥ १५ 9.12.15

इक्ष्वाकूणामयं वंशः सुमित्रान्तो भविष्यति।

यतस्तं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ॥ १६9.12.16

पृष्ठ 66

परीक्षित्! इक्ष्वाकुवंशके इतने नरपति हो चुके हैं। अब आनेवालोंके विषयमें सुनो। बृहद्बलका पुत्र होगा बृहद्रण॥ ९॥ बृहद्रणका उरुक्रिय, उसका वत्सवृद्ध, वत्सवृद्धका प्रतिव्योम, प्रतिव्योमका भानु और भानुका पुत्र होगा सेनापति दिवाक॥ १०॥ दिवाकका वीर सहदेव, सहदेवका बृहदश्‍व, बृहदश्‍वका भानुमान्, भानुमान्का प्रतीकाश्‍व और प्रतीकाश्‍वका पुत्र होगा सुप्रतीक॥ ११॥ सुप्रतीकका मरुदेव, मरुदेवका सुनक्षत्र, सुनक्षत्रका पुष्कर, पुष्करका अन्तरिक्ष, अन्तरिक्षका सुतपा और उसका पुत्र होगा अमित्रजित्॥ १२॥ अमित्रजित्से बृहद्राज, बृहद्राजसे बर्हि, बर्हिसे कृतंजय, कृतंजयसे रणंजय और उससे संजय होगा॥ १३॥ संजयका शाक्य, उसका शुद्धोद और शुद्धोदका लांगल, लांगलका प्रसेनजित् और प्रसेनजित्का पुत्र क्षुद्रक होगा॥ १४॥ क्षुद्रकसे रणक, रणकसे सुरथ और सुरथसे इस वंशके अन्तिम राजा सुमित्रका जन्म होगा। ये सब बृहद्बलके वंशधर होंगे॥ १५॥ इक्ष्वाकुका यह वंश सुमित्रतक ही रहेगा। क्योंकि सुमित्रके राजा होनेपर कलियुगमें यह वंश समाप्त हो जायगा॥ १६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे
इक्ष्वाकुवंशवर्णनं ४
नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    विसृष्टिश्‍चाभवत्ततः।

    (मुद्रित पृष्ठ 65)
  2. २

    दनम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 65)
  3. ३

    तस्मात् प्रश्रुतपुत्रस्तु सन्धि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 65)
  4. ४

    प्राचीन प्रतिमें ‘ततः..पुनः’ यह पूर्वार्ध नहीं है, इसके स्थानपर वर्तमान प्रतिमें आया हुआ ‘भविता...मित्रजित्’ यह बारहवाँ श्‍लोक दिया है, इसमें भी ‘मरुदेवो’ के स्थानमें ‘मनुदेवो’ पाठ है।

    (मुद्रित पृष्ठ 65)
  5. १

    बृहद्भुजस्तु।

    (मुद्रित पृष्ठ 66)
  6. २

    तस्मात्साध्योऽथ।

    (मुद्रित पृष्ठ 66)
  7. ३

    लाः स्मृताः।

    (मुद्रित पृष्ठ 66)
  8. ४

    वंशानुकथने श्रीरामचरिते।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 66)

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